BPSC Specific: बिहार का आधुनिक इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका

BPSC Specific: बिहार का आधुनिक इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका

BPSC GS Special: बिहार का आधुनिक इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका (Detailed Notes)

बिहार न केवल प्राचीन भारत में ज्ञान और अध्यात्म की भूमि रहा है, बल्कि आधुनिक भारत के इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम (Indian Freedom Struggle) में भी इसकी भूमिका अत्यंत गौरवशाली और निर्णायक रही है। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ उठने वाली पहली आवाजों से लेकर सन 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ तक, बिहार के वीरों और जन-आंदोलनों ने देश की आजादी की नींव को मजबूत करने का काम किया।

बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की Combined Competitive Exam (CCE) चाहे प्रीलिम्स (Prelims) का स्टेज हो या मेन्स (Mains) का डिस्क्रिप्टिव उत्तर-लेखन (Answer Writing), “बिहार का आधुनिक इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम” से सबसे अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं। इस विस्तृत आर्टिकल में हम 1857 की क्रांति से लेकर 1947 की आजादी तक बिहार के अतुलनीय योगदान को एक विश्लेषणात्मक (Analytical) और व्यवस्थित दृष्टिकोण से समझेंगे।

1. 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और बाबू कुंवर सिंह का नेतृत्व

1857 के महान स्वाधीनता संग्राम (Revolt of 1857) में बिहार क्रांति के प्रमुख केंद्रों में से एक था। बिहार में क्रांति की शुरुआत 12 जून 1857 को देवघर जिले (वर्तमान झारखंड) के रोहिणी गांव से हुई थी। इसके बाद 3 जुलाई 1857 को पटना में पुस्तक विक्रेता पीर अली के नेतृत्व में एक विशाल विरोध प्रदर्शन हुआ, जिसे अंग्रेजों ने क्रूरता से दबा दिया।

  • जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह का अमर बलिदान:

    • 80 वर्ष की अवस्था में जगदीशपुर (भोजपुर) के परमार राजपूत राजा बाबू कुंवर सिंह ने जिस वीरता का परिचय दिया, वह इतिहास में अद्वितीय है।

    • उन्होंने शाहबाद क्षेत्र में ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंका और अंग्रेजों की ‘कैप्टन डनबर’ तथा ‘मेजर एर’ की सेना को पराजित किया।

    • गंगा नदी पार करते समय हाथ में गोली लगने पर उन्होंने अपना हाथ काटकर गंगा मैया को समर्पित कर दिया था।

    • कुंवर सिंह के भ्राता अमर सिंह ने छापामार युद्ध प्रणाली (Guerrilla Warfare) को जारी रखा और कैमूर की पहाड़ियों से अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी।

2. बिहार के प्रमुख जनजातीय एवं किसान आंदोलन (Tribal & Peasant Movements)

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषक भू-राजस्व नीतियों (Land Revenue Policies) और जल-जंगल-जमीन पर कब्जे के खिलाफ बिहार और छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासियों तथा किसानों ने उग्र विद्रोह किया:

  • संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion – 1855-56):

    • सिधु, कान्हू, चांद और भैरव के नेतृत्व में राजमहल की पहाड़ियों (Damin-i-Koh) में जमींदारों और ब्रिटिश महाजनों के खिलाफ यह विद्रोह हुआ।

  • मुंडा उलगुलान / बिरसा मुंडा आंदोलन (1899-1900):

    • बिरसा मुंडा (धरती आबा) ने आदिवासियों की पारंपरिक ‘खूंटकट्टी व्यवस्था’ (सामूहिक खेती) को बहाल करने और दीकुओं (बाहरी शोषकों) को बाहर निकालने के लिए आंदोलन चलाया।

  • ताना भगत आंदोलन (Tana Bhagat Movement – 1914):

    • जतरा भगत के नेतृत्व में उरांव जनजाति द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन मूलतः एक अहिंसक एवं सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन था, जो बाद में महात्मा गांधी के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गया।

3. चंपारण सत्याग्रह (1917): भारतीय राजनीति में गांधी जी का पदार्पण

1917 का Champaran Satyagraha न केवल बिहार के इतिहास में, बल्कि संपूर्ण भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट (Turning Point) सिद्ध हुआ।

  • तीनकठिया प्रणाली (Tinkathia System): अंग्रेजों ने चंपारण के किसानों के लिए अपनी कुल भूमि के 3/20 भाग पर नील (Indigo) की खेती करना अनिवार्य कर दिया था। रासायनिक रंगों के आने के बाद जब नील का बाजार गिर गया, तब भी अंग्रेज किसानों से भारी लगान वसूली कर रहे थे।

  • राजकुमार शुक्ल का योगदान: लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन (1916) में चंपारण के किसान नेता राजकुमार शुक्ल ने गांधी जी से मुलाकात की और उन्हें चंपारण के किसानों की दयनीय स्थिति देखने के लिए आमंत्रित किया।

  • सत्याग्रह की सफलता: महात्मा गांधी 10 अप्रैल 1917 को पटना और फिर चंपारण पहुंचे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, जे.बी. कृपलानी, और ब्रजकिशोर प्रसाद जैसे नेताओं ने उनका साथ दिया। गांधी जी के अहिंसक प्रतिरोध के आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और ‘चंपारण एग्रेरियन कमेटी’ की सिफारिश पर तीनकठिया प्रथा को समाप्त कर किसानों को 25% अवैध वसूली वापस की गई।

4. खिलाफत और असहयोग आंदोलन में बिहार की भूमिका (1920-22)

महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए Non-Cooperation Movement (असहयोग आंदोलन) को बिहार में अभूतपूर्व जनसमर्थन मिला:

  • सदाकत आश्रम और बिहार विद्यापीठ की स्थापना:

    • मौलाना मजहरुल हक ने पटना के पास दिघा में सदाकत आश्रम की स्थापना की और यहाँ से ‘दी मदरलैंड’ (The Motherland) नामक अखबार निकाला, जिसने राष्ट्रवादी चेतना फैलाने का काम किया।

    • 6 फरवरी 1921 को महात्मा गांधी ने बिहार विद्यापीठ का उद्घाटन किया, ताकि बहिष्कार (Boycott) के बाद छात्र अपनी राष्ट्रीय शिक्षा जारी रख सकें।

  • प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार: दिसंबर 1921 में जब प्रिंस ऑफ वेल्स का पटना आगमन हुआ, तो शहर में पूर्ण हड़ताल रखी गई।

5. किसान सभा और वामपंथी आंदोलन (Peasant Movement & Swami Sahajanand)

1920 और 1930 के दशक में बिहार के किसानों को संगठित करने में स्वामी सहजानंद सरस्वती का योगदान अतुलनीय रहा:

  • बिहार प्रांतीय किसान सभा (BPKS – 1929): सोनपुर मेले के अवसर पर स्वामी सहजानंद सरस्वती की अध्यक्षता में बिहार प्रांतीय किसान सभा का गठन हुआ, जिसके सचिव श्रीकृष्ण सिंह बने।

  • अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS – 1936): लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन हुआ, जिसके अध्यक्ष स्वामी सहजानंद और सचिव एन.जी. रंगा बने।

  • बकाश्त भूमि आंदोलन: कार्यानंद शर्मा, राहुल सांकृत्यायन और यदुनंदन शर्मा के नेतृत्व में जमींदारी प्रथा और बकाश्त जमीन को लेकर उग्र आंदोलन चलाए गए।

6. सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह (Civil Disobedience Movement – 1930)

गांधी जी के दांडी मार्च के बाद बिहार में भी नमक सत्याग्रह (Salt Satyagraha) का आह्वान किया गया। चूँकि बिहार एक समुद्र-तटीय राज्य नहीं था, इसलिए यहाँ नमकीन मिट्टी से नमक बनाने की अनूठी पहल की गई:

  • सब्जीबाग और सारण में नमक सत्याग्रह: 16 अप्रैल 1930 को पटना के नखास पिंड पर नमक कानून तोड़ा गया।

  • चौकीदारी कर ना देने का आंदोलन (No-Chowkidari Tax Campaign): बिहार के निवासियों ने पुलिस और अंग्रेजों के जासूसों के रूप में काम करने वाले चौकीदारों को दिए जाने वाले ‘चौकीदारी टैक्स’ को देने से साफ इंकार कर दिया। यह आंदोलन मुंगेर, सारण और शाहाबाद में काफी सफल रहा।

7. बिहार का पहला प्रांतीय मंत्रिमंडल (First Congress Ministry – 1937)

1935 के भारत शासन अधिनियम (Government of India Act 1935) के तहत 1937 में प्रांतीय चुनाव आयोजित किए गए:

  • बिहार में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला। शुरुआती गतिरोध के बाद 20 जुलाई 1937 को डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में बिहार के पहले कांग्रेस मंत्रिमंडल का गठन हुआ।

  • अनेकांत सिन्हा को बिहार विधानसभा का अध्यक्ष और अब्दुल बारी को उपाध्यक्ष चुना गया।

  • इस सरकार ने राजनीतिक बंदियों की रिहाई, किसान सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किए, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) में भारत को बिना पूछे शामिल करने के विरोध में अक्टूबर 1939 में इस्तीफा दे दिया।

8. भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement – 1942) और अगस्त क्रांति

9 अगस्त 1942 को जब ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ के तहत सभी बड़े राष्ट्रीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, तब बिहार की जनता ने क्रांति की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

  • सचिवालय गोलीकांड (11 अगस्त 1942):

    • पटना सचिवालय (Secretariat) पर तिरंगा फहराने का प्रयास कर रहे 7 युवा छात्रों पर पटना के तत्कालीन जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्चर के आदेश पर गोलियां चलाई गईं।

    • इसमें उमाकांत प्रसाद सिन्हा, रामानंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगपति कुमार, देवीपद चौधरी, रामगोविंद सिंह, और राजेंद्र सिंह शहीद हो गए। यह घटना बिहार की देशभक्ति की सबसे बड़ी मिसाल बनी।

  • जयप्रकाश नारायण और आजाद दस्ता (Azad Dasta):

    • हजारीबाग जेल की दीवार फांदकर भागे जयप्रकाश नारायण (JP), राममनोहर लोहिया और अरुणा आसफ अली ने नेपाल की तराई (राजविराज) में ‘आजाद दस्ता’ का गठन किया।

    • आजाद दस्ते ने युवाओं को छापामार युद्ध और ब्रिटिश इंफ्रास्ट्रक्चर (रेलवे, टेलीग्राफ) को नष्ट करने का प्रशिक्षण दिया।

  • समानांतर सरकारें: मुजफ्फरपुर, सारण, और उत्तरी बिहार के कई हिस्सों में ब्रिटिश शासन पूरी तरह समाप्त हो गया था और जनता की अपनी अदालतें व सरकारें चलने लगी थीं।

BPSC मेन्स के लिए मुख्य तथ्य एवं हस्तियां (Key Personalities)

महान व्यक्तित्व (Personality) मुख्य योगदान (Key Contribution)
डॉ. राजेंद्र प्रसाद चंपारण सत्याग्रह के प्रमुख सहयोगी, संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के प्रथम राष्ट्रपति।
डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह ‘बिहार विभूति’, चंपारण सत्याग्रह और 1937 के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री।
अनुसुइया देवी / प्रभावती देवी जयप्रकाश नारायण की पत्नी, जिन्होंने महिला स्वतंत्रता सेनानियों को संगठित किया।
मौलाना मजहरुल हक होम रूल लीग के अध्यक्ष, सदाकत आश्रम के संस्थापक और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक।

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जाए तो आधुनिक बिहार का इतिहास त्याग, बलिदान और निरंतर संघर्ष की कहानी है। 1857 के बाबू कुंवर सिंह के तलवार की धार से लेकर 1942 के छात्रों के अमर बलिदान तक, बिहार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के हर चरण को दिशा देने का काम किया। BPSC परीक्षा के दृष्टिकोण से इन ऐतिहासिक घटनाओं, आंदोलनों और व्यक्तित्वों की समझ विकसित करना न केवल उच्च अंक दिलाता है, बल्कि बिहार की समृद्ध विरासत पर गर्व करने का अवसर भी प्रदान करता है।

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